रचना चोरों की शामत

Saturday, 14 May 2016

हुई हिक सिंधी बोली



दुनिया जे हर माण्हूँअ वटि आ, पहिंजी बोली।
मिली असाँ खे पिणि सिंधी, हिक प्यारी बोली।

सभ खाँ आहि पुराणी असाँजी सिंधु-सभ्यता
अऊँ सिंधी आ, हुन जी धीय सियाणी बोली 

जहिं थे लोदे पींघोलोली ई सुम्हारियो
कहिं कारण सा वई असाँखाँ विसिरी बोली

बार नईं पीढ़ीय जा दियनि प्या, रोजु दोरापा
छो न सेखारियव दादी! असाँखे, मिठिड़ी बोली। 

दिण सिंधी सभु मिली मनायो, सिक साँ सरत्यूँ
कायम रहे जिएँ पुरखनि जी थाती  बोली

गीत, , गायल संतनि जा बुधो बुधायो
कविताऊँ, ग़ज़लूँ बि लिखनि हीय सुहिणी बोली

सिंधुड़ी छदिजी वई मगर आ फ़र्ज़ु असाँजो
दिजे कहिं न पहिंजी अमरु निशानी बोली    

शल न अचे हू दींहु कल्पना’, सिन्धी वंशज
अँग्रेजीअ मेँ पढ़नि, हुई हिक सिन्धी बोली। 

-कल्पना रामानी   

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