रचना चोरों की शामत

Friday, 3 June 2016

अचु गदिजी गाल्हायूँ साथी

वधंदड़ि विथी मिटायूँ साथी। 
अचु गदिजी गाल्हायूँ साथी।

रुस्यल हुजाँ माँ, या कि रुसें तूँ
हिक बिए खे परिचायूँ साथी।

तुहिंजो-मुहिंजो, चई छो पहिंजे
सुख में सेंध लगायूँ साथी।

सोरे चुभंदड़ कंडा, सेज ताँ
गुलिड़ा छो न विछायूँ साथी।

सिक जी लोली ई रात खे
सुपिना सुठा सदायूँ साथी

प्रेम-दिये जी लौ जिएँ भभके
वेढ़ि जी वटि छो वधायूँ साथी। 

दिल्यूँ मिलनि जहिंसाँ, हिक बिए खे
अहिड़ी ग़ज़ल बुधायूँ साथी। 
 
ओरे अचु त दिलिनि जा कल्पना’ 
मुंझल सगा सुलझायूँ साथी। 

-कल्पना रामानी 

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