रचना चोरों की शामत

Thursday, 7 July 2016

उभ में शहर

पंज-फुटी पिञिरन में पलंदा, घर दिठा सें।
प्या उनि उभ में शहर, बेपर दिठा सें।

काह कातिनि जी जहिं खाँ थी बननि ते
मोर बन-बन जा कटायल-पर दिठा सें।

हर पहर दिसिजनि खुल्यल प्या माल-होटल
बंद लेकिन सभु, दिलिन जा, दर दिठा सें।

अन्न-जल जा दे पई होका हुकूमत
ऐं हरनि-खेतनि जा हक़, बंजर दिठा सें।

सचु त आहे, नारी आ नारीय जी दुश्मन
पर नज़र में तिनि जी दोही, नर दिठा सें।

ई-वठी दिल, दु रहनि, तोड़िन पो रिश्ता
अहिड़ा अजुकल्ह दोस्त! सौदागर दिठा सें।

ख़ुदकुशी प्या कनि खुशी खुद ही विञाए
कल्पना अहिड़ा बि कुछु कायर दिठा सें। 

-कल्पना रामानी

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