रचना चोरों की शामत

Friday, 5 August 2016

पुट्रिड़ो दर्शनु दियण अचे थो

दिठुमि त रस्तो, साफ़ु थिए थो।  
शायद  कोई,  शाहु  अचे  थो।

वाह ड़ी सिक! चुगंदड़ि झिरकिनि साँ
भाकुर  पाए,  जारु   मिले  थो। 

अटिक्यो हूँदसि को कमु,  मूँमें
चाँहिं  पियारिण  लाइ  सदे थो!

दुखु त मिलणु चाहे थो सुख साँ
पर हिन खे हू दिसी लिके थो।

नओं  सालु  आ, माउ  ठरे पई
पुट्रिड़ो  दर्शनु  दियण  अचे थो। 

भुल  साँ  हीय अखि, फरंदी  हूँदी
कींअ  चवाँ, को  यादि करे थो।

छो  खुदि  खे  माँ  मञ्याँ अकेली
हिं  खुदा  मूँ  साणु रहे थो। 

-कल्पना रामानी 

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