रचना चोरों की शामत

Tuesday, 25 October 2016

सुहिणी, दियड़ो बार!

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करि सिघो सींगारु, सुहिणी, दियड़ो बार!
आयो शुभ त्योहारु, सुहिणी, दियड़ो बार!

रात अमावस, णु त लगे पई, चाँड्रोकी 
झिलमिल आ संसारु, सुहिणी, दियड़ो बार!

आई खणी आ, धन जा बेड़ा, दरि लछमी
करि हुन जो सत्कारु, सुहिणी, दियड़ो बार!

बारे फटाका, खूबु ट्रिड़नि प्या दिसु गुलिड़ा 
घरु-घरु आ गुलज़ारु, सुहिणी, दियड़ो बार!

ठाहे खणी अचु, पूजा-थाल्ही, भोगु भरे
चाढ़ि गुलनि जो हारु, सुहिणी, दियड़ो बार!

सुर में आरती, गाइ पिरिनि साँ, तूँ गदिजी
भली कंदो करतारु, सुहिणी, दियड़ो बार!

वरंदी रहे हर सालि  दियारी, हिन ज में 
कटे दुखनि जो जारु, सुहिणीदियड़ो बार!

-कल्पना रामानी

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